जगदलपुर। बस्तर की धरती पर आयोजित बस्तर हेरिटेज मैराथन में इस बार एक ऐसी कहानी निकलकर सामने आई है, जो अनुशासन और कभी हार न मानने वाले जज्बे की मिसाल बन गई है। भारतीय सेना के जांबाज जवान मानकूराम नाग ने इस दौड़ में द्वितीय स्थान प्राप्त कर न केवल अपनी शारीरिक क्षमता का परिचय दिया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि अगर लक्ष्य पर नजर हो, तो शुरुआती बाधाएं मायने नहीं रखतीं। मूलतः बड़ेडोंगर (गोड़मा) के निवासी मानकूराम के लिए यह सफर आसान नहीं था, क्योंकि दौड़ शुरू होने के वक्त वे एक अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण ट्रैक से दूर थे और मुख्य रेस शुरू होने के करीब 10 मिनट बाद उन्होंने अपनी दौड़ शुरू की थी।
अबूझमाड़ हॉफ मैराथन में पूर्व में प्रथम स्थान प्राप्त कर चुके मानकूराम ने बताया कि रेस शुरू होने से कुछ देर पहले वे अपने एक मित्र की मदद करने के लिए बाथरूम की ओर चले गए थे। इसी बीच दौड़ को हरी झंडी दिखा दी गई और जब तक वे वापस लौटे, अन्य धावक काफी आगे निकल चुके थे। एक पल के लिए ऐसा लगा कि शायद अब पदक की उम्मीद खत्म हो चुकी है, लेकिन सेना के प्रशिक्षण और उनके भीतर के एथलीट ने उन्हें रुकने नहीं दिया। उन्होंने धैर्य और साहस के साथ दौड़ना शुरू किया और एक-एक करके अन्य प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए अंततः दूसरे स्थान पर फिनिश लाइन को पार किया।
भारतीय सेना में वर्ष 2016 में चयनित मानकूराम वर्तमान में राजस्थान के बीकानेर में अपनी बटालियन के साथ तैनात रहकर देश की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपनी यूनिट को भी दिया, जो उन्हें एथलेटिक्स में सक्रिय रहने और विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए निरंतर प्रोत्साहित करती रहती है। बस्तर की संस्कृति के प्रति गहरा लगाव रखने वाले मानकूराम पिछले साल भी अबूझमाड़ मैराथन आयोजन का हिस्सा रहे थे और इस बार उन्होंने अपनी रैंकिंग में सुधार करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। अपने परिवार में माता-पिता और भाई के साथ खुशियाँ साझा करने वाले मानकूराम अब सेना में पदोन्नति की ओर अग्रसर हैं। उनकी यह उपलब्धि क्षेत्र के युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है कि खेल के मैदान में तकनीक के साथ-साथ मानसिक दृढ़ता ही आपको विजेता बनाती है।



