दंतेवाड़ा। वर्तमान में खेती किसानी एवं मत्स्य पालन व्यवसाय का तालमेल कृषकों के आजीविका और उन्नति के बहुमुखी स्रोत के रूप में उभरा है। जो पूरे कृषि परिदृश्य में आमूलचूल परिवर्तन लाकर कृषकों के जीवन स्तर को एक सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से टिकाऊ सुरक्षा प्रदान करता है। तात्पर्य है कि मौसम परिवर्तन का सीधा असर जहां फसल उत्पादन पर पड़ता हैं वहीं फसलों के बाजार मूल्य में उतार चढ़ाव भी कृषकों की कुल आय पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है। ऐसी स्थिति में मत्स्य पालन जैसे व्यवसाय कृषकों के लिए ’’सपोर्ट सिस्टम’’ का काम करते है। बस्तर जैसे अंचल में जहां के अधिकतर कृषक वर्षा आश्रित फसलों पर निर्भर रहते है वहां खेती के अलावा इसी से संबंधित पशुपालन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन जैसे व्यवसायों पर ध्यान केन्द्रित करना अब आवश्यकता बनता जा रहा हैं। और अगर मत्स्य पालन की बात करें तो यह देखा गया है कि बस्तर जिले के किसानों के पास अक्सर खेतिहर भूमि के बाद भी ऐसी भूमि बची रह जाती है जिनका उपयोग नहीं हो पाता और अगर ऐसी भूमि जल स्रोतों के निकट हो तो मछली पालन के लिए यह आदर्श स्थल साबित हो सकती है। इस क्रम में जिले के कई ऐसे जागरूक और प्रगतिशील किसान भी है जिन्होंने खेती के साथ-साथ सफल मत्स्य पालन करके अपनी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार लाया है जो अन्य कृषकों के लिए प्रेरणास्रोत है।
विकासखंड दंतेवाड़ा के ग्राम फुलनार के सन्तुराम पोडि़याम पिता बोना राम भी इन्हीं सफल कृषकों में से एक है। जो खेती और मछली उत्पादन से जुड़ कर अपनी वार्षिक आय में पर्याप्त वृद्धि करके अपने जीवन को समृद्ध बनाया है। उनका कहना है कि धान की खेती उनका पुश्तैनी कार्य है जो उन्हें हर परिस्थिति में करना ही है। परन्तु वे हमेशा से ही धान के खेती के साथ-साथ अन्य समानान्तर व्यवसाय को अपनाना चाहते थे धान खेती में अत्यधिक मेहनत और लागत तथा कामगारों की कमी तथा संतोषजनक उत्पादन न होने जैसी समस्याओं के चलते मत्स्य पालन ने उन्हें आकर्षित किया और अंततः मत्स्य विभाग से संपर्क के जरिए उन्हें अपनी भावी योजनाओं को साकार करने का मौका मिला। उन्होंने तत्काल विभाग के सहयोग से अपने 1.00 हेक्टेयर की भूमि में तालाब खुदवाया। नवीन तालाब निर्माण कर मछली पालन कार्य प्रारंभ किया। इसके साथ ही मत्स्य विभाग द्वारा विभागीय योजना अन्तर्गत जैसे मत्स्य पालन की आधुनिक तकनीक, आईस बाक्स, जाल, फिश माऊंट, अंगुलिका संचयन योजना अंतर्गत मछली बीज मछुआ प्रशिक्षण से उनको लाभान्वित किया गया। जिससे उनकी आमदनी में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई और आज वे मछली पालन करके प्रति वर्ष लगभग 2 लाख रूपये का शुद्ध आय अर्जित प्राप्त कर रहे है।



