जगदलपुर/बस्तर न्यूज
गुरु अर्जन देव के शहीदी दिवस पर गुरुवार को जगदलपुर के शांति नगर स्थित गुरुद्वारे में सिख समाज द्वारा श्रद्धा और आस्था के साथ विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में सिख समाज के लोगों के साथ विभिन्न समाजों के श्रद्धालुओं ने भी उपस्थित होकर गुरु साहिब को नमन किया और गुरुओं के लंगर का प्रसाद ग्रहण किया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रातःकालीन अरदास, कीर्तन और गुरु वाणी के पाठ के साथ हुई। गुरुद्वारे में श्रद्धालुओं ने मत्था टेककर मानवता, भाईचारे और सेवा भाव का संदेश ग्रहण किया। पूरे दिन गुरुद्वारा परिसर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। सिख समाज के सेवादारों ने संगत के लिए शरबत और लंगर की व्यवस्था की थी। जिसमें सभी वर्गों और समुदायों के लोगों ने एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण किया।

गुरु अर्जन देव जी के शहीदी दिवस पर विगत माह से समाज के बच्चों को गुरुवाणी का वाचन करना सिखाया गया जिसमें 25 बच्चों ने हिस्सा लेकर गुरुवाणी पढ़ना सिखा। जिन्हें आज समाज द्वारा सम्मानित किया गया। साथ ही सिख समाज के बच्चे जो नगर के विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई कर 10वी और 12वीं क्लास में पास हुए हैं, उन्हें भी सिख समाज द्वारा संचालित गुरु नानक पब्लिक हायर सेकेंडरी स्कूल के द्वारा प्रोत्साहन स्वरूप प्रथम 3100/- द्वितीय 2100/- एवं 1100/- रुपए नकद राशि दिया गया। जिसमें 10वीं क्लास की अशनित कौर, अशमीत सिंह, प्रभाजोत सिंह तथा 12वीं क्लास दलजीतप्रीत सिंह बख्शी, सिरत कौर, प्रेखेर रिया, सहजप्रीत सिंह, जपीत सिंह आदि छात्र-छात्राओं सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर रागी जत्था द्वारा गुरु अर्जन देव जी के जीवन और उनके महान बलिदान पर प्रकाश डाला। वर्ष 1563 में गोइंदवाल साहिब में जन्मे गुरु अर्जन देव जी सिख धर्म के पांचवें गुरु थे। उनके पिता गुरु रामदास जी और माता बीबी भानी थीं। गुरु अर्जन देव जी बचपन से ही आध्यात्मिक विचारों, विनम्र स्वभाव और मानव सेवा के प्रति समर्पित थे। गुरु अर्जन देव जी ने सिख धर्म को संगठित और सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अमृतसर में हरमंदिर साहिब, जिसे आज स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है, के निर्माण कार्य को पूर्ण कराया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हरमंदिर साहिब के चारों द्वार सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोगों के लिए खुले रहें, जो समानता और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है। गुरु अर्जन देव जी ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ का संकलन भी कराया, जिसमें सिख गुरुओं के साथ-साथ विभिन्न संतों और भक्तों की वाणी को स्थान दिया गया। यह उनके उदार और समावेशी दृष्टिकोण का प्रतीक है। इतिहासकारों के अनुसार, गुरु अर्जन देव जी ने सत्य, न्याय और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वर्ष 1606 में उन्हें तत्कालीन मुगल शासक जहांगीर के शासनकाल में अमानवीय यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों और आस्था से कभी समझौता नहीं किया। इसी कारण उन्हें सिख धर्म का प्रथम शहीद गुरु माना जाता है।

गुरुद्वारा सिख कमेटी के पदाधिकारियों ने कहा कि गुरु अर्जन देव जी का जीवन त्याग, सेवा, सहिष्णुता और मानव कल्याण की प्रेरणा देता है। उनका संदेश आज भी समाज को एकता, सद्भाव और निस्वार्थ सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। शहीदी दिवस के अवसर पर संगत ने गुरु साहिब के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।




