दंतेवाड़ा। विश्व प्रसिद्ध 75 दिवसीय ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में शामिल मावली परघाव के लिए शारदीय नवरात्र की अष्टमी तिथि पर मां दंतेश्वरी की पावन डोली एवं राजछत्र आज दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए पारंपरिक विधि-विधान के साथ रवाना हुए। पूरे नगर में भक्ति, आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। हजारों श्रद्धालुओं ने गाजे-बाजे, मोहरी की गूंज, लोक नृत्य और जयकारों के बीच मां की डोली को भावभीनी विदाई दी।

टेम्पल कमेटी के अध्यक्ष एवं कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने आंवराभाटा स्थित माई जी के चबूतरे पर विधिवत पूजा-अर्चना कर मां दंतेश्वरी से जिले की सुख-समृद्धि, शांति एवं और निरंतर प्रगति का आशीर्वाद मांगा तथा डोली एवं छत्र को जगदलपुर के लिए रवाना किया।
सलामी और परंपराओं के बीच निकली ऐतिहासिक यात्रा
मां दंतेश्वरी की डोली दंतेवाड़ा स्थित मंदिर से रवाना होने से पहले मंदिर के मुख्य द्वार पर पुलिस बल ने पहली सलामी देकर सम्मान अर्पित किया। इसके बाद मंदिर समिति के व्यवस्थापकों एवं पुजारियों ने पारंपरिक पूजा संपन्न कराई। डोली आगे बढ़ते ही पूरा नगर श्रद्धा के रंग में रंग गया। पारंपरिक वाद्य यंत्रों, मोहरी की मधुर धुनों और लोक नृत्य दलों की प्रस्तुति के बीच यात्रा जय स्तंभ चौक से होती हुई डंकनी नदी पुल तक पहुंची, यात्रा के साथ मंदिर के प्रधान पुजारी जिया बाबा, मांझी, चालकी, कुम्हार, राउत, समरथ तथा सेवादार परंपरागत रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हुए पैदल चल रहे थे। हजारों श्रद्धालु पूरे मार्ग में “जय मां दंतेश्वरी” के जयकारों के साथ डोली के पीछे-पीछे चलते रहे।
आंवराभाटा में हुई विशेष पूजा, फिर वाहनों के काफिले से रवाना हुई डोली
डंकनी नदी पार करने के बाद आंवराभाटा स्थित माई जी के चबूतरे पर डोली को कुछ समय के लिए विराम दिया गया। इसके पश्चात फूलों से सजे वाहनों के विशेष काफिले में डोली एवं राजछत्र को आगे की यात्रा के लिए रवाना किया गया। वही हारम चौक पहुंचने पर पुनः पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके बाद परंपरा के अनुसार मां के प्रधान पुजारी डोली को पैदल लेकर गीदम नगर सीमा स्थित फॉरेस्ट नाका तक जाएंगे। वहां से डोली पुनः वाहनों के काफिले के साथ कोड़ेनार और तोकापाल में निर्धारित पूजा स्थलों पर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रुकेगी और अंततः जगदलपुर स्थित जिया डेरा पहुंचेगी, जहां मावली परघाव की ऐतिहासिक रस्म संपन्न होगी।
बस्तर दशहरा की आत्मा है मावली परघाव
बस्तर दशहरा देश के अन्य दशहरा उत्सवों से अपनी परंपरा और स्वरूप के कारण अलग पहचान रखता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव भगवान राम की विजय गाथा के बजाय बस्तर की अधिष्ठात्री देवी मां दंतेश्वरी की आराधना पर केंद्रित है। मावली परघाव वह ऐतिहासिक अवसर है, जब दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी की डोली जगदलपुर पहुंचकर वहां की परंपरागत देवी मावली माता से मिलन करती है। इसे बस्तर राजपरंपरा, आदिवासी आस्था और सांस्कृतिक एकता का सबसे पवित्र और भावनात्मक क्षण माना जाता है।जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचने पर पुलिस बल द्वारा मां की डोली को अंतिम सलामी दी जाएगी। परंपरा के अनुसार डोली 26 अक्टूबर तक जगदलपुर में विराजमान रहेगी और बस्तर दशहरा की विभिन्न ऐतिहासिक रस्मों में सहभागिता निभाएगी। निर्धारित धार्मिक अनुष्ठानों के संपन्न होने के बाद 27 अक्टूबर 2026 को मां दंतेश्वरी की डोली एवं छत्र जगदलपुर से दंतेवाड़ा के लिए वापसी यात्रा पर रवाना होंगे।
